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हमें तो याद आएंगे चचे : डॉ० अनिल दीक्षित, संपादक

मैं आगरा बोल रहा हूं। आजकल दुख में हूं, सही कहूं तो बहुत बुरे दौर में। एक आम-से दिखने वाले इंसान की मौत मुझे मर्माहत कर रही है, भयभीत हूं भविष्य से और उनसे जो इस इंसान के न होने पर मुझे नोच-नोचकर खा जाएंगे। डीके जोशी नहीं रहे, यह सत्यता है लेकिन मैं फिर भी उम्मीद में हूं कि शायद दुनिया से ना हारने वाला यह योद्धा जीतकर लौट आए। मैं जो भी हूं, उन्हीं की वजह से हूं वरना दिन में 12-12 घंटे विद्युत कटौती तो आम थी। मैं वो वीआईपी शहर नहीं था, जो आज हूं।

और मैं... ताजमहल की वजह से दुनिया में विख्यात इस शहर का एक और आम आदमी हूं। करीब ढाई दशक तक आज, अमर उजाला, दैनिक जागरण, आई नेक्स्ट में पत्रकारिता में सक्रिय रहा। आगरा के कई दौर देखे हैं मैंने। ताजमहल है जरूर लेकिन उसकी कोई औकात ही नहीं थी। देश-दुनिया से आते पर्यटक बेहाल होकर लौटते। खुद ताजमहल प्रदूषण की मार से बेहाल था। बिजली के न आने का समय था और न जाने का। कई घंटे तक लगातार कटौती के बाद अचानक बिजली का गुल होना भी यहां आम बात थी। सब-कुछ बेढ़ब, बेहाल। एेसे में डीके जोशी का उदभव हुआ। जोशी तब तक सफाईकर्मियों के नेता थे, एकछत्र। नगर निगम में एेतिहासिक पड़ाव से चर्चित हुए जोशी ने ताजमहल को बचाने की बागडोर संभाली। उनकी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने ताज संरक्षित क्षेत्र प्राधिकरण गठित किया और छह सौ करोड़ का प्रावधान कर दिया।

भ्रष्टाचार की घुन लग जाती यदि जोशी नहीं होते। एक भी पैसे का दुरुपयोग होता तो वह चीखने-चिल्लाने लगते। शीर्ष कोर्ट ने मॉनीटरिंग कमेटी बनाई और उन्हें एवं रमन को सदस्य नियुक्त कर दिया। इस दराेगा ने कभी गलत होने नहीं दिया, डीएम-कमिश्नर सब लाइन में। कोई भी इस हाल में नहीं दिखा कि जोशी की बात का विरोध करता। उनके प्रयासों पर कई अहम मसले सुलझे और सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कोर्ट कमिश्नर की तैनाती की। आगरा में लगभग सारे तालाब लील गए बिल्डरों पर उन्होंने कड़ी नजर रखी। हाईकोर्ट तक गए और आदेश कराकर लाए। प्रशासन ढीला नहीं पड़ता तो कई तालाबों पर खड़ीं गगनचुंबी इमारतें धूल में मिल गई होतीं। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण में वह बिल्डरों के गले में फांस बनकर अटके रहे। मामला प्राधिकरण में लंबित है और कड़े आदेश की पूरी संभावना है। इसी तरह झोलाछाप डॉक्टरों का भी उन्होंने ही 'इलाज' किया। मुद्दे तमाम हैं। यह कहूं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आगरा के विकास और उसकी समस्याओं से जुड़े हर मुद्दे में जोशी आगे थे। आगरा के विकास की गाथा जब भी लिखी जाएगी, उनका नाम लिये बिना वो कतई पूरी नहीं होगी।

जोशी आगरा के पत्रकारों में 'चचे' उपनाम से प्रसिद्ध थे। कभी खबरों का टोटा होता, तो हम बेहिचक उन्हें फोन मिलाते, और शानदार खबर हाथ में आ जाती। कभी-कभी तो ब्रेकिंग न्यूज़ की सूचना देकर खुद बुला लेते। मैं उन दिनों दैनिक जागरण में था। अखबार बेशक पुराना था लेकिन खबरों की विश्वसनीयता की दृष्टि से उसे खरा नहीं माना जाता था। यह अखबार का कठिन दौर था। कोई खबर यदि अमर उजाला में छपी होती तो सौ प्रतिशत सत्य मान ली जाती। इस दौर में चचे काम आए। आगरा के विकास की तमाम योजनाओं में भ्रष्टाचार के घुन टटोलने में उन्होंने हमारी टीम की खूब मदद की। हम जब चाहते, वो सीढ़ी चढ़कर दैनिक जागरण कार्यालय आ जाते। हम फाइलें उलटते-पलटते, जो कागज चाहते, ले लेते। चाय की चुस्कियों के बीच चचे बतियाते रहते। हम पूछते, इतना बेखौफ रहते हो, कोई मार देगा। स्कूटर छोड़ दो चचे, सुरक्षा में घूमा करो। तो बिंदास चेहरा खिलखिला उठता। बोलते- मारकर तो देखे कोई, मेरा भूत शमसान में नहीं छोड़ेगा उसे। कभी भी पुराने से स्कूटर पर घूमते दिख जाते। हर अखबार में उनके बराबर के संपर्क थे। कभी किसी खबर में किसी से उन्होंने अन्याय नहीं किया। कोई ब्रेकिंग न्यूज देते, तो शर्त होती कि सभी अखबारों में बांटनी होगी।

बात उन दिनों की है जब मैं पुष्प सवेरा का संपादक था, जिसके बिल्डर बीडी अग्रवाल मालिक थे। अग्रवाल और चचे के बीच छत्तीस का आंकड़ा। चचे एेसा बांस थे, जो अग्रवाल तो न दिन में चैन से बैठने देते और न रात को सोने। स्थानीय संपादक सुरेंद्र सिंह ने जोशी और अग्रवाल की मुलाकात की कोशिशें शुरू कीं। अग्रवाल चाहते थे लेकिन जोशी अड़े थे। बमुश्किल इस बात के लिए तैयार हुए कि अखबार के आफिस में आकर इंटरव्यू देंगे। चचे तय समय पर पहुंच गए पर, सिंह ने अग्रवाल को भी बुला लिया। आफिस के बाहर अग्रवाल की कार देखकर चचे बिदक गए। फोन पर बोले, सुरेंद्र सिंह तुमसे बात हुई थी, वादा किया था इसलिये आ गया हूं। बाहर आकर इंटरव्यू करा लो। लाख मनुहार की, चचे अंदर नहीं आए। हम लोग बाहर आए तो जोशी गर्मजोशी से मिले। यह कहते हुए स्कूटर स्टार्ट करके चले गए कि इस जनम में तो इस आदमी से नहीं मिलूंगा। तुम लोग मेरा इंटरव्यू नहीं छाप पाओगे, क्योंकि लाला जो चाहता है, वो मैं करूंगा नहीं। उधर, अग्रवाल के चेहरे पर पराजय के भाव थे। किसी चमचे ने कहा, आप तो परम शक्तिशाली हो, मरवा क्यों नहीं देते इसे। जवाब मिला, कैसे मरवा दूं। यह मर गया तो हंगामा बरप जाएगा। जीते जी मारा जाऊंगा। कई बार कोशिश कर चुका हूं पर एक कदम भी नहीं डिगता। चचे से जुड़े तमाम किस्से हैं, कहानियां हैं। चचे आगरा की सांसों में हैं, स्मृतियों में हैं। उन्हें कोई नहीं भूल सकता, क्योंकि उनके किये काम हर समय उनकी याद दिलाते रहेंगे। 

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