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भारत को इंडिया बनाने को है आज भी विज्ञान के प्रचार-प्रसार की आवश्यकता... जाने क्यो


दोस्तो, मेरा नाम मेकमीर है और मैं पेशे से एक सॉफ्टवेर इंजीनियर हूँ| कल न्यूज़ में देखा तो पता चला कि छठ पूजा के दिन बिहार के किसी इलाक़े में वहां की कुछ महिलाओं ने मंदिर के डस्टबिन (कूड़ेदान) को भगवान की मूर्ति समझकर पूज डाला। वैसे यह कोई नया वाक्या नही है। ऐसे ही कई घटनाएं आए दिन देखने या सुनने को हमें मिलती ही रहती है जिनका विज्ञान तो छोड़ो धर्म से ही कोसों दूर-दूर का कोई नाता नही होता। धार्मिक अंधता जब बढ़ती जाती है तो वह अंधविश्वास का रूप ले लेती है। बिना तर्क और धार्मिक ज्ञान के जब लोग ऐसे कार्य करने लग जाते हैं जोकि उनको श्रध्दा लगती है वह आगे जाकर ढोंगी बाबाओ, पाखंडी लोगों के द्वारा बड़ी ही आसानी से छली जा सकती है।

वैसे तो भारत में संवैधानिक तौर पर धर्म की आज़ादी है फिर चाहें कोई कूड़ेदान पूजे या फिर कुतिया देवी का मंदिर बनवाए लेकिन पूजा-पाठ के नाम पर अंधविश्वास को फलते-फूलते देखना भी संविधान के विज्ञान से सम्बंधित नियमों के विरुद्ध ही है। अतः मुझे लगता है कि भारत में धर्म की ही तरह विज्ञान के प्रचार-प्रसार की सख़्त आवश्यकता है। अब यूँ तो धर्म और विज्ञान को मनाने वाले अपने-अपने क्षेत्र को श्रेष्ठ बताते रहें हैं लेकिन हम "कौन बड़ा" के विवाद में न पड़कर कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि अपने आस-पास के लोगों, फ्रेंड सर्किल में रोज़ाना एक बात किसी टॉपिक पर करें जोकि विज्ञान से संबंधित हो। विज्ञान में नित नए अविष्कार और खोजें अभी हाल ही में हुई हैं। 

पुरानी पीढ़ी या काफी अनपढ़ लोग इस बात से अनभिज्ञ हैं अतः जो जानकर लोग हैं उनका यह नैतिक कर्तव्य है कि अन्य लोगों को भी बताएं। हो सकता है कि आपका ज्ञान और तर्कशक्ति आपके आस-पास के लोगों से श्रेष्ठ हो तो ऐसे में उनको उन्ही की भाषा में सरलीकरण करके टॉपिक डिस्कस किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर आप उनसे सवाल करें कि बताओ बटन दवाने पर पंखा कैसे घूमने लगता है या फिर बिजली क्या होती है और तारों में कैसे बहती है और इस से चीजें कैसे चलने लगती है। टीवी में प्रोग्राम कैसे आते हैं, मोबाइल पर दूर बैठे कैसे बात हो जाती है, वर्षा कैसे होती है, चांद-सूरज कैसे काम करते हैं, दिन-रात कैसे होते हैं, हम धरती पर कैसे टिके हुए हैं। आदि-इत्यादि बहुत से ऐसे प्रश्न है। इस तरह विज्ञान के प्रसार-प्रचार के दो फायदे होंगे एक तो आपकी नॉलेज भी रिफ्रेश होती रहेगी, दूसरा अन्य लोगों के सोचने और समझने का दायरा भी बढ़ता रहेगा। जहां बुद्धि का विकास शुरू हुआ वहीं अंधविश्वास पर चोट पड़नी अपने आप शुरू हो जाएगी। अंधविश्वास का विरोध करने के  बजाय यदि हम लोगों को इस क़ाबिल ही बना दें कि वह खुद इस बात को जान सकें कि जो वो कर रहें है वह न तो धार्मिक है और न ही वैज्ञानिक तो मुझे लगता है कि अंधविश्वास का सफ़ाया स्वत: ही हो जाएगा।

स्टूडेंट्स लोग ध्यान दें कि विज्ञान के नियमों को समझने के लिए गणित में योग्य होना अति आवश्यक है। याद रहे कि मैं सिर्फ जोड़, गुणा या भाग तक ही सीमित गणित की बात नही कर रहा हूँ। गणित में तर्क (लॉजिक), प्रोब्लेम्स, एकुएशन्स, फंक्शन्स आदि बहुत ज़रूरी है। इन्ही के आधार पर फॉर्मूले बनाए जाते है जोकि समस्त जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों, पृथ्वी, चंद्रमा, सूर्य ही नही बल्कि समस्त ब्राम्हण पर एक समान रूप से लागू होते हैं। ऐसा भी नही है कि विज्ञान के पास सभी सवालों के उत्तर हैं और ऐसा भी नही है कि वैज्ञानिकों ने सबकुछ समझ ही लिया है। विज्ञान में नित नई संभावनाओं को तलाश कर सकने, उनके हल ढूंढने, कुछ नया सोचने, कुछ नया करने आदि के विकल्प हमेशा से ही खुले हुए हैं। सामान्य लोगों की तर्कशक्ति यदि बढ़ा दी जाए तो क्या पता इन्ही में से कोई नया अल्बर्ट आइंस्टीन पैदा हो जाए।

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