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गांधी परिवार ही उबरेगा काँग्रेस की डूबती नैया

अशरफ शेख़, कानपुर


दिल्ली : कांग्रेस में पिछले काफी समय से उठा पटक जारी है पार्टी के वरिष्ठ नेता कहीं खो से गए हैं और नेतृत्व में एकात्मकता बुरी तरह हावी है।पार्टी के पिछले दो चुनावों के नतीजों को छोड़ भी दिया जाए तो ऐसा बहुत कुछ है जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है की भारत की दूसरी सबसे बड़ी राष्ट्रिय पार्टी में सब कुछ अस्त व्यस्त चल रहा है।मोदी सरकार की दूसरी पारी की शुरुआत से पहले ही पार्टी के कई प्रमुख नेता बीजेपी में शामिल हो गए जिसका नतीजा चुनाव के परिणामों पर भी कुछ हद तक पड़ा। जैसे तैसे कहीं कहीं पार्टी ने जीत दर्ज की तो राजस्थान और मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्यों में मुख्यमंत्री पद के लिए वरिष्ठ नेता बनाम युवा नेता के झगड़े ने पार्टी की परेशानियों में इजाफा किया। इसके बाद पार्टी के कई सांसदों-विधायकों ने पार्टी का दामन छोड़ बीजेपी के सबका साथ सबका विकास के नारे को अपना लिया। पिछले पाँच छह सालों में कांग्रेस पार्टी की अंदरुनी कलह खुल कर सामने आती रही हैं और जब तब इनकी वजह से पार्टी को नुकसान ही उठाना पड़ा है।

क्या है असली मुद्दा 
मुद्दा कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रिय अध्यक्ष की नियुक्ति का है। शनिवार को कांग्रेस की वर्किंग कमेटी की लम्बी बैठक के बाद घूम फिरकर सोनिया गांधी को सर्वसहमति से पार्टी अध्यक्ष चुना गया। राहुल गांधी के पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफे के बाद से कांग्रेस की इस पद के लिए किसी योग्य नेता की तलाश अब तक जारी है। इससे पहले वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोहरा को कांग्रेस का अंतरिम अध्यक्ष बनाया गया था। सोनिया गांधी के पार्टी अध्यक्ष बनने से फिर वही बात सामने आने लगी है कि देखा जाये तो कांग्रेस पार्टी की राजनीति गांधी परिवार के इर्द गिर्द ही घूम रही है और पार्टी के कई वरिष्ठ नेता घूम फिरकर इनकी ही तरफ लौटते हैं।कभी प्रियंका गांधी के सहारे डूबती नैया को पार लगाने की कोशिश की जाती है तो कभी राहुल गांधी के हाथों युवा नेतृत्व की बागडोर देकर,और अंत में कुछ नतीजा नहीं तो फिर सोनिया गांधी तो हैं ही।कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता पार्टी के इस बुरे वक्त में अपनी जिम्मेदारियों से बचते नज़र आ रहे हैं।

क्या जानकारों का मानना
राजनितिक जानकारों यही मानना है कि गांधी परिवार की लोकप्रियता उनकी पार्टी का विश्वास लोगों में फिर से जगाएगी। सही मायनों में देखा जाए तो ये बीते ज़माने की बातें हैं।यूपीए शासनकाल में हुए घोटालों और कई अन्य मामलों में गांधी परिवार और उनके करीबियों के नाम सामने आने से पार्टी की छवि को नुकसान ही हुआ है। अब देखना ये है की सोनिया गांधी किस तरह से बिखरी हुई और अस्त व्यस्त पार्टी को बीजेपी के मजबूत नेतृत्व के सामने खड़ा करती हैं।

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