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अमेरिका ने किया क्रूज मिसाइल टेस्ट... जाने क्या थी INF संधि

अशरफ शेख़, कानपुर


अमेरिका : इंटरमीडिएट रेंज न्यूक्लियर फोर्सेज(आईएनएफ)संधि से अलग होने के करीब दो सप्ताह बाद ही अमेरका ने क्रूज मिसाइल का परीक्षण कर शीट युद्ध की दस्तक दे दी है।इस परीक्षण के बाद रूस ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। रूस के उप विदेश मंत्री सर्गेई रेबकोव ने इस परीक्षण को अफसोसजनक बताया। यह संधि अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचेव के बीच वर्ष 1987 में शीतयुद्ध के दौरान पारंपरिक और परमाणु दोनों प्रकार की मध्यम दूरी की मिसाइलों की शक्तियों को सीमित करने के लिये हुई थी। इसके तहत 500 से 5500 किमी. रेंज की सभी प्रकार की बैलेस्टिक और क्रूज़ मिसाइल के विकास, उत्पादन और तैनाती पर प्रतिबंध लगाए गए थे। यह संधि अमेरिका और रूस के बीच एक द्विपक्षीय समझौता था, यह किसी भी अन्य परमाणु संपन्न देशों पर कोई प्रतिबंध नही लगाती है।

संधि से हटने की वजह
अमेरिका ने रूस पर संधि के प्रावधानों के उल्लंघन का आरोप लगाया, जबकि रूस ने इस प्रकार के आरोपों को निराधार बताया । नाटो ने अमेरिका के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि रूस की 9M729 मिसाइल ने INF समझौते का उल्लंघन किया है। INF समझौते के तहत 500 से 5500 किमी. की दूरी तक की मिसाइलों को समाप्त करने का वादा किया गया था। इस संधि से यूरोप में रूसी SS-20 मिसाइलों और अमेरिका के M26 पर्शिंग टैंकों की तैनाती पर रोक लगाई गई थी। रूस की RSD-10 पायनियर मिसाइलों को यूरोप में SS-20 मिसाइल कहा जाता था। रूस के द्वारा इनका प्रयोग शीतयुद्ध के दौरान किया गया था। वही अमेरिका के M26 पर्शिंग टैंकों का प्रयोग द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी पर आक्रमण के लिये किया गया था।


अमेरिका के संधि से हटने के प्रभाव
एशिया में चीन के बढ़ते सैन्य वर्चस्व का मुकाबला अमेरिका हथियारों के आधुनिकीकरण के माध्यम से करने में सक्षम होगा क्योंकि चीन के पास इन्वेंट्री इंटरमीडिएट रेंज मिसाइल की क्षमता है। अमेरिका द्वारा इस प्रकार की क्षमता विकसित करने में INF संधि बाधा बन रही थी। इस तरह के कदम से दक्षिण चीन सागर में चीन का मुकाबला करने में अमेरिका को मदद मिलेगी, विशेष रूप से जहाँँ चीन की सेना ने कई विवादित द्वीपों को अपने नियंत्रण में ले लिया है।

संयुक्त राज्य अमेरिका ने यूरोप में नई परमाणु-सशस्त्र मिसाइलों को तैनात नहीं करने का वादा किया है। लेकिन इसने पारंपरिक हथियारों की तैनाती पर ऐसा कोई वादा नहीं किया है। अमेरिका अब अपने और अपने सहयोगियों द्वारा नियंत्रित प्रशांत तथा अन्य क्षेत्रों के द्वीपों पर मध्यम दूरी के पारंपरिक हथियारों को तैनात कर सकेगा। संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस संधि से अमेरिका के हटने के कदम को अत्यंत विनाशकारी कहा है क्योंकि अब परमाणु हथियारों और बैलिस्टिक मिसाइलों की वैश्विक होड़ बढ़ जाएगी जिसके परिणामस्वरूप परमाणु निशस्त्रीकरण के लक्ष्यों को भी प्राप्त करना आसान नहीं होगा।

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