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जानिए... क्यों पड़ा फरीब खान का नाम शेरशाह सूरी

आनन्द मोहन शुक्ल, दिल्ली


बाबर के एक मामूली सेनापति जो आगे चलकर बिहार का राज्यपाल बनता है | आज हम बात कर रहे है जिसका नाम है शेरशाह सूरी | शेर शाह सूरी का जन्म 1486 ई० में बिहार के सहसा राम में हुआ था | इनका असली नाम फरीब खान कबीले था | एक बार बिहार के राज्यपाल पर चुपके से शेर उनके ऊपर हमला कर देता है और शेर शाह ने शेर को मार गिराते हैं तभी से सभी लोग उनको शेरशाह के नाम से बुलाने लगते हैं | इनके पिता का नाम मियां हसन सूरी था |  जिनकी 2 पत्नियां और 8 बच्चें थे |  इनकी सौतेली माँ इन्हें बहुत सताती थी जिसके कारण यह घर छोड़कर जौनपुर भाग जाते हैं लेकिन वहाँ पर भी परिवार वालों के कारण नही रहने को  मिलता है | इसके बाद वह बिहार के राज्यपाल बाहरखान के यहां रहने लगते हैं | उनके पुत्र का नाम जलाल खान था | उनके पिता के मृत्यु हो जाने के बाद जलाल खान को राज्यपाल बनाया जाता है और तब उन्हें शेर शाह से डर लगने लगता है | इसके बाद वह बाबर के सेनापति नियुक्ति होते है | 1527 से लेकर 1528 तक बाबर के सेनापति रहते है और उसके बाद अपने दम पर बिहार के राज्यपाल बन जाते हैं | 

1534 ई० में शेरशाह ने सूरजगढ़ की जंग में जीत हासिल करता है | यही से उनके राज्य का विस्तार होता है | 1538 ई० में बिहार पर आक्रमण होता है और इस जंग में शेरशाह ने महमूद शाह को बुरी तरह से हरा देता है | उधर मुगल बादशाह हुमायूं अपनी राज्य का विस्तार कर रहा था और 1539 ई० में चौसा की जंग में हुमायूं और शेरशाह का आमना सामना होता है इस जंग में हुमायूं को हार का सामना करना पड़ता है | यही तक नही रुकता है जंग दुबारा 1540 ई० में कन्नौज में होता है और एक बार फिर हुमायूं को शेरशाह हरा देता है और तभी हुमायूं हिंदुस्तान को छोड़कर भाग जाता हैं | शेरशाह सूरी 1542 में मालवा की जंग में बिना लड़ाई किये ही फतह हासिल करते हैं | एक के बाद एक किला पर फतह हासिल करते हैं | जब शेरशाह सूरी 22 मई 1545 ई० में कालिंजर के किले की घेराबंदी करते समय उनकी मृत्यु हो जाती है क्योंकि वह गनपाउडर से किला को गिराना चाहते हैं और वह इस किला को गिरा नहीं पाते हैं | हिंदुस्तान का पहला रुपया शेरशाह के शासन काल में चलता है | 

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