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अमृता प्रीतम ने दिया कविता को नया चेहरा...जाने

खबर : रोशन मिश्रा, चंदौली 


प्रतिभा इंसानी मज़हब और रीति -रिवाजों के सरहद को भी पार कर जाती हैं। आज हम एक ऐसी ही शख्शियत की बात करेंगे जिसनी अपनी कलम की धार से अपनी जमीन तैयार की। हिन्दी और पंजाबी साहित्य पर समान पकड़ रखने वाली अमृता प्रीतम ,नज्म की दुनिया में एक मशहूर नाम है। अमृता जी ने एक बार अपने बारे में लिखा था कि " परछाईंया पकड़ने वालो, छाती में जलने वाली आग की परछाई नहीं होती। " बचपन में अपने घर की ही धार्मिक माहौल में अमृता ने अपने ख्वाबों के बारे में लिखना आरंभ कर दिया था। बचपन को गम में जीने के कारण उनका ईश्वर से नाता कम रहा। उनका बचपन और शुरूआती शिक्षा का केन्द्र लाहौर रहा। बचपन से ही रूढिवादियों के खिलाफ रहीं। सोलह साल की उमर में पहला संकलन लिखा। उनके पहले संकलन का नाम ' अमृत लहरें' था। उन्होनें अपने जीवन के मार्मिकता को अपनी आत्मकथा ' रसीदी टिकट ' में बड़े सहजता के साथ प्रस्तुत किया। 

सरदार प्रीतम सिंह से अमृता का विवाह हुआ था परन्तु यह रिश्ता बहुत जल्दी 1960 में अलगाव में तबदील हो गया, हालांकि तब से अमृता ' प्रीतम ' सरनेम के साथ ताउम्र जुड़ी रहीं। उन्हें विभाजन की कसक हमेशा सालती रही। उन्होनें विभाजन के दर्द को अपनी नज्म  " अज्ज अक्खां वारिस शाह नू " में बखूबी बयां किया। बटवारे का जख्म ऐसा था कि उन्होनें अविस्मरणीय उपन्यास ' पिंजर ' में बड़े ही दर्दनाक लहजे में उसका वर्णन किया है।  साल 2003 में डा चन्द्र प्रकाश द्विवेदी द्वारा निर्मित कालजयी फिल्म ' पिंजर ' उन्हीं के उपन्यास का वर्णन करता है| विभाजन से पहले अमृता ने लाहौर रेडियो प्रसारण में भी काम किया था। बंटवारे के बाद दिल्ली में उन्होनें अपना निवास बनाया तथा वहीं दिल्ली रेडियो प्रसारण पर अपना मधुर आवाज देती रहीं। साहित्य जगत में अविस्मरणीय योगदान के लिए उन्हें 1956 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1969 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1986-1992 तक वो राज्य सभा की सदस्य भी नहीं। ' कागज ते कैनवास ' के लिए उन्हें ग्यानपीठ पुरस्कार भी मिला था। अंततः भारतीय साहित्य की यह अनमोल रोशनी 31 अक्टूबर 2005 को 86 साल की उमर में लम्बी बीमारी के कारण हमेशा के लिए बुझ गई। 

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